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Questions


 

 

    

     Welcome Everyone Peacock

 

 

 

Soji Rao .

Radha Swami .

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

“अगर आप परमात्मा से मित्रता कर लें तो आप कभी अकेला महसूस नहीं करेंगे"
                    मिट जायेगा गुनाहों का एहसास दुनिया से दोस्तों
                     अगर आ जाये यकीं (भरोसा) के देख रहा है कोई

                        Soji Rao  Mobile No.- (0)9468099028

                                               >JaanV<

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

               The Divine Power of Thought

               ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ
             ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ஜ۩۞۩ஜ♥♥♥♥♥♥♥♥♥ஜ۩۞۩ஜ♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥

 

"success is not the key to happiness but happiness is the key to success“

 

 

Book2

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

जीवन में लक्ष्य का होना ज़रूरी क्यों है ?
Hi friendz,
यदि  आपसे पूछा जाये कि क्या आपने अपने लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित कर रखे हैं तो आपके सिर्फ दो ही जवाब हो सकते हैं: हाँ या ना .
अगर जवाब हाँ है तो ये बहुत ही अच्छी बात है क्योंकि ज्यादातर लोग तो बिना किसी निश्चित लक्ष्य के ही ज़िन्दगी बिताये जा रहे हैं और आप उनसे कहीं बेहतर इस्थिति में हैं. पर यदि जवाब ना है तो ये थोड़ी चिंता का विषय है. थोड़ी इसलिए क्योंकि भले ही अभी आपका कोई लक्ष्य ना हो पर जल्द ही सोच-विचार कर के अपने लिए एक लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं.लक्ष्य या Goals  होते क्या हैं? लक्ष्य एक ऐसा कार्य है जिसे हम सिद्ध करने की मंशा रखते हैं."Goal is a task which we intend to accomplish". कुछ examples लेते हैं: एक  student का लक्ष्य हो सकता है: Final Exams  में 80% से ज्यादा marks लाना. एक employee लक्ष्य हो सकता है अपनी performance  के basis पे promotion पाने का. एक house-wife का लक्ष्य हो सकता है : Home based business कि शुरुआत करना. एक blogger का लक्ष्य हो सकता है: अपने ब्लॉग कि page rank शुन्य से तीन तक ले जाना” एक समाजसेवी का लक्ष्य हो सकता है:” किसी गाँव के सभी लोगों को साक्षर बनाना.

 

 

 

लक्ष्य का होना ज़रूरी क्यों है:
१) सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए: जब आप सुबह घर से निकलते हैं तो आपको पता होता है कि आपको कहाँ जाना है और आप वहां पहुँचते हैं , सोचिये अगर आपको यह नहीं पता हो कि आप को कहाँ जाना है तो भला आप क्या करेंगे? इधर उधर भटकने में ही समय व्यर्थ हो जायेगा. इसी तरह इस जीवन में भी यदि आपने अपने लिए लक्ष्य नहीं बनाये हैं तो आपकी ज़िन्दगी तो चलती रहेगी पर जब आप बाद में पीछे मुड़ कर देखेंगे तो शायद आपको पछतावा हो कि आपने कुछ खास achieve  नहीं किया!! लक्ष्य व्यक्ति को एक सही दिशा देता है. उसे बताता है कि कौन सा काम उसके लिए जरूरी है और कौन सा नहीं.  यदि goals clear हों तो हम उसके मुताबिक अपने आप को तैयार करते हैं. हमारा subconscious mind हमें उसी के अनुसार act करने के लिए प्रेरित करता है. दिमाग में लक्ष्य साफ़ हो तो उसे पाने के रास्ते भी साफ़ नज़र आने लगते हैं और इंसान उसी दिशा में अपने कदम बढा देता है.
२) अपनी उर्जा का सही उपयोग करने के लिए: भागवान ने इन्सान को सीमित उर्जा और सिमित  समय दिया है. इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि हम इसका उपयोग सही तरीके से करें. लक्ष्य हमें ठीक यही करने को प्रेरित करता है. अगर आप अपने end-goal को ध्यान में रख कर कोई काम करते हैं तो उसमे आपका concentration और energy का  level कहीं अच्छा होता है. For Example: जब आप किसी  library में बिना किसी खास किताब को पढने  के मकसद से जाते हैं तो आप यूँ ही  कुछ किताबों को उठाते हैं और उनके पन्ने पलटते हैं और कुछ एक पन्ने पढ़ डालते हैं, पर वहीँ अगर आप कसी Project Report को पूरा करने के मकसद से जाते हैं तो आप उसके मतलब कि ही किताबें चुनते हैं और अपना काम पूरा करते हैं. दोनों ही cases में आप समय उतना ही देते हैं पर आपकी  efficiency में जमीन-आसमान का फर्क होता है. इसी तरह life  में भी अगर हमारे सामने कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है तो हम यूँ ही अपना  energy  waste करते रहेंगे और नतीजा कुछ खास नहीं निकलेगा. लेकिन इसके विपरीत जब हम लक्ष्य को ध्यान में रखेंगे तो हमारी energy सही जगह उपयोग होगी और हमें सही results देखने को मिलेंगे.
३) सफल होने के लिए: जिससे पूछिए वही कहता है कि मैं एक सफल व्यक्ति बनना चाहता.पर अगर ये पूछिए कि क्या हो जाने पर वह खुद को सफल व्यक्ति मानेगा तो इसका उत्तर कम ही लोग पूर विश्वास से दे पाएंगे. सबके लिए सफलता के मायने अलग-अलग होते हैं. और यह मायने लक्ष्य द्वारा ही निर्धारित होते हैं. तो यदि आपका कोई लक्ष्य नहीं है तो आप एक बार को औरों कि नज़र में सफल हो सकते हैं पर खुद कि नज़र में आप कैसे decide  करेंगे कि आप सफल हैं या नहीं?  इसके लिए आपको अपने द्वारा ही तय किये हुए लक्ष्य को देखना होगा.
४) अपने मन के विरोधाभाष को दूर करने के लिए:  हमारी life में कई opportunities  आती-जाति रहती हैं. कोई चाह कर भी सभी की सभी opportunities का फायदा नहीं उठा सकता. हमें अवसरों को कभी हाँ तो कभी ना करना होता है. ऐसे में ऐसी  परिस्थितियां आना स्वाभाविक है, जब हम decide  नहीं कर पाते कि हमें क्या  करना चाहिए. ऐसी situation  में आपका लक्ष्य आपको guide कर सकता है. जैसे मेरा और मेरी wife  का लक्ष्य एक  Beauty Parlour खोलने का है, ऐसे में अगर आज उसे एक ही साथ दो job-offers मिलें , जिसमें से एक किसी पार्लर से हो तो वह बिना किसी confusion के उसे ज्वाइन कर लेगी , भले ही वहां उसे दुसरे offer के comparison  में कम salary मिले. वहीँ अगर सामने कोई लक्ष्य ना हो तो हम तमाम factors को evaluate करते रह जायें और अंत में  शायद ज्यादा वेतन ही deciding factor  बन जाये.
दोस्तों  अर्नोल्ड एच ग्लासगो का कथन  ”फुटबाल कि तरह ज़िन्दगी में भी आप तब-तक आगे नहीं बढ़ सकते जब तक आपको अपने लक्ष्य का पता ना हो.  मुझे बिलकुल उपयुक्त लगता है. तो यदि आपने अभी तक अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित किया है तो इस दिशा में सोचना शुरू कीजिये.

 

 

 

आपके विचारों में होती है दिव्य-शक्ति
हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों के वचनामृत हैं कि हमारे विचारों में एक दिव्य-शक्ति हुआ करती है| यही कारण है कि यह असाधारण और अलौकिक शक्ति हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व की परिचायिका है|  अक्सर लोगों को कहते सुना है कि जैसा हम सोचते हैं वैसे ही हम बनते हैं पर कभी-कभी हम किसी अन्य व्यक्ति की विचारधारा से इतना अधिक प्रभावित हो जाते हैं कि हमारा व्यक्तित्व मात्र उसी व्यक्ति का प्रतिबिम्ब बन कर रह जाता है और कभी-कभी इसके विपरीत कोई अन्य भी हमारे विचारों से अत्यधिक प्रभावित हो जाता है |सच तो यह है कि हममें से कोई भी पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो कर विचार नहीं कर सकता क्योंकि हम अपने जीवन का प्रत्येक क्षण किसी न किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थिति अथवा परिस्थिति से प्रभावित हो कर ही व्यतीत करते हैं जिसके परिणाम स्वरुप हमारे विचारों का उद्गम या निर्माण होता है |

 वस्तुतः, हमारे विचारों में निहित वह दिव्य-शक्ति जो किसी भी विचार के हमारे मन में उदय होते ही उस विचार को कार्य रूप में परिणत करने के लिए तत्पर हो जाती है,वह है हमारे मन की संकल्प शक्ति | जब भी हमारे मन में कोई इच्छा उदय होती है या कोई विचार व्यक्त होता है तो यही संकल्प शक्ति पूरी ईमानदारी और स्वामिभक्ति के साथ मन के द्वारा दिये जाने वाले आदेश को पूरा करने के लिये तैयार हो जाती है | लेकिन अफ़सोस ! उसी क्षण हमारे अंतःकरण की सतह   पर किसी दूसरी इच्छा की लहर विकल्प के रूप में आ खड़ी होती है और हमारे मन की वह संकल्प शक्ति अपना पहला काम अधूरा छोड़कर ,दूसरा आदेश पूरा करने में लग जाती है और यह चक्र चलता ही रहता है तथा हमारी यह दिव्य शक्ति लट्टू की तरह केवल घूमती ही रह जाती है | इस  तरह पूर्ण सामर्थ्यवान तथा शक्तिमान होने के बावज़ूद भी हमारी यह संकल्प शक्ति हमारे संशयात्मक आदेश तथा विरोधी इच्छाओं के एक साथ उठ खड़े होने के कारण सफलता पूर्वक अपना कार्य नहीं कर पाती |इस तरह  मानव-मन की संकल्प शक्ति की यह दुर्दशा होती है |

दरअसल,हम अपने अज्ञान के कारण ही अपनी इस दिव्य शक्ति को कमज़ोर करते हैं |यदि हम केवल एक ही विचार को केन्द्र बनाकर मन में कोई इच्छा करें, उसमें आने वाली विरोधी इच्छाओं या विचारों पर नियंत्रण करें तो हमारी वह इच्छा ज़रूर पूरी होती है |भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में ,अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है –
‘संशयात्मा विनश्यति’
अर्थात् मतिभ्रम व्यक्ति विनष्ट हो जाया करता है|वस्तुतः, समाहित या एकाग्र-चित्त ही हमारे मन की गतिशीलता को स्थिर करता है और उचित मार्ग पर चलने के लिए दिशा-निर्देश करता है| तभी तो फलीभूत इच्छाओं के अनुरूप ही हमारा व्यक्तित्व ढलता है|उदहारण के लिए-आज यदि कोई व्यक्ति ए़क सफल वैज्ञानिक है तो ज़रूर उसने एक वैज्ञानिक होने की इच्छा को सदैव बल दिया होगा |अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता का भाव बनाये रखकर ,उसे सम्पूर्ण करने के लिए विश्वास और ईमानदारी से प्रयास किए होंगे तथा बीच-बीच में विरोधी इच्छाओं के उदय से मानसिक-संतुलन को बिगड़ने नहीं दिया होगा |
अंततः,यही कहना चाहती हूँ कि अपने सामान्य जीवन में भी, जब कभी हमें कोई साधारण सी भी अनुभूति,दिव्य-अनुभूति, सुखानुभूति या सौन्दर्यानुभूति होती है तो उसे हम किसी न किसी प्रकार समाज में व्यक्त करना चाहते हैं, किसी को बताना चाहते हैं या किसी के साथ अपने विचारों को बाँटना चाहते हैं तभी तो विभिन्न विषयों पर ज्ञान-विज्ञान के अनेक ग्रंथों के     साथ-साथ प्रत्येक भाषा में कवि  भी दिखाई देते हैं |दूसरे,यह भी तो हम चाहते हैं कि हमारी इच्छाएं पूरी होती रहें, तो बस हमें इतना ही तो करना है कि अपनी इस दिव्य-शक्ति, अपने मन की संकल्प शक्ति को एकाग्रता एवं स्वतंत्रता से काम करने दें अर्थात् अपनी ढेर सारी विरोधी इच्छाओं और अपने अनगिनत संशयों के भार से उसे मुक्त रखते हुए, हम एक समय में एक   ही सद्-विचार पर केंद्रित होना सीख लें ताकि हमारे विचारों की सकारात्मक ऊर्जा सर्वत्र फैलती रहे और हमारी इच्छाएँ भी फलती-फूलती रहें और हम, यथाम्भव दूसरों को भी फलते-फूलते देखकर फूले न समायें |

 

 

 

व्यक्तित्व = शरीर ,मन, बुद्धि और आत्मा
‘अच्छीखबर’ के अच्छे –अच्छे मित्रों से लेखन –द्वारा आज यह पहली भेंट हो रही है | ‘ज़िंदगी’ की यात्रा में यह भेंट चिरायु हो ,ऐसी मेरी कामना है | हमारे ऋषियों का मत है कि मानव एक ही समय में शारीरिक रूप में जीने के साथ-साथ सुन्दर -विचारों एवं पवित्र- आदर्शों का जीवन भी जीता है|मानव के विचार ही उसके व्यक्तित्व का दर्पण होते हैं |

दरअसल,जीवन अनुभवों की एक अनवरत धारा है |जब व्यक्ति संसार के संपर्क में आता है, तो उसकी प्रतिक्रियाएँ ही उसके अनुभव बन जाती हैं –कुछ खट्टे और कुछ मीठे |इन्हीं खट्टे- मीठे अनुभवों के परिप्रेक्ष्य  में जब हमारे ऋषियों ने विचार किया तो पाया कि जब हम किसी बाह्य वस्तु के संपर्क में आते हैं तो हमारा वह अनुभव हमारे व्यक्तित्व की चार इकाइयों के रूप में होकर पूर्ण होता है- शरीर ,मन, बुद्धि और आत्मा व्यक्तित्व की इन चारों इकाइयों में  जितना अधिक सामंजस्य एवं एकता होगी ,हमारा व्यक्तित्व भी उतना ही सुदृढ़ होगा |
 जीवन में कभी-कभी इच्छाएँ पूरी हो जातीं हैं ,सपने भी पूरे हो जाते हैं लेकिन बौद्धिक-स्तर पर  हम संतुष्ट नहीं हो पाते और कभी शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक इन तीनों स्तर पर संतुष्ट होने के बावजूद भी एक अधूरेपन का अहसास हमारा पीछा नहीं छोड़ता | हम किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न नहीं रह पाते क्योंकि हमारे व्यक्तित्व की चारों इकाइयां शरीर ,मन ,बुद्धि और आत्मा एक –दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित न कर सकने के कारण, एक दूसरे की विरोधी होकर हमें अपनी –अपनी ओर खींचती हैं |परिणामस्वरूप ,हमारी शांति ,हमारा सुख ,हमारी प्रसन्नता और हमारा आनंद –सब कुछ धीरे –धीरे बिखरने लगता है | पर हम तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना और बुद्धिजीवी हैं ,ऐसे कैसे हार मान सकते हैं ?हमारे लिए तो हमारे ऋषियों ने परिस्थितियों के ‘स्वामी’ बनने का स्वप्न देखा है ,हम उसे निष्फल कैसे जाने दे सकते हैं? हमारे ऋषियों ने सूक्ष्म विश्लेषण करने पर पाया कि हमारे शारीरिक ,मानसिक तथा बौद्धिक रूप से शांत क्षणों में भी एक दबी हुई निःशब्द पुकार हमारे अंतरतम की गहराई से उठती है कि कुछ ऐसा करना या पाना है जिससे जीवन के वास्तविक रूप से साक्षात्कार हो जाए और यह पुकार इतनी गहरी तथा तीव्र होती है कि उसे नकारा भी नहीं जा सकता | इसी का नाम आध्यात्मिक पुकार है |
जीवन एक बहती –धारा है |कर्म तो हमें करना ही है और प्रसन्नता ,सुख , समृद्धि, शांति एवं आनंद की इच्छा किये बिना हम रह  नहीं सकते ,तब हमें चाहिए कि हम अपने अनुभवों को परख कर अपनी आध्यात्मिक पुकार को सुनकर ,बुद्धि से यह निश्चित कर लें कि इस लक्ष्य मन का संकल्प की प्राप्ति के लिए जीवन में कैसे प्रयत्नशील दौड़धूप हों | अंततः ,मैं यही कहना चाहती हूँ कि ईश्वर करें कि  हम सब  सुन्दर विचारों और पवित्र आदर्शों की आधारशिला पर गर्व से खड़ा ‘जीवन’ जी सकें और अपने जीवन में आनेवाली प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हमारा व्यक्तित्व सुदृढ़ बना रहे |

 

 

 

रेय-मार्ग पर चलकर करें अपने सपनों को साकार
वस्तुतः, इस धरा पर ‘मनुष्य’ ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट सृष्टि है |मनुष्य, सच में महान् है क्योंकि केवल वही अपने मन, बुद्धि, ज्ञान, शक्ति और सामर्थ्य के उपकरणों द्वारा प्रकृति की धीमी गतिसे चलने वाली, क्रमिक-विकास प्रणाली को तीव्र गति प्रदान कर पाता है|विकास ही तो मानव का चरम लक्ष्य होता है| लेकिन अपने ॠषियों के इन वचनों से भी तो मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि आत्मा ही वह तत्व है जो ईश्वर के रूप में इस सम्पूर्ण प्रकृति का नियामक अर्थात् शासक है| इस प्रकार हमारे शरीर, मन और बुद्धि का अधिष्ठाता यह ‘आत्मा’ ही हमें चेतन बनाता है एवं समस्त कार्य-व्यापर करने के लिए प्रेरित करता है | दरअसल, मनुष्य की सुख-प्राप्ति की बलवती इच्छा ही समस्त प्राणी-जगत् के सम्पूर्ण कार्य-व्यापार के चलने का प्रमुख कारण है |
हम सभी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित हैं कि जीवन का कोई भरोसा नहीं होता|यह तो इतना अधिक अप्रत्याशित है कि कोई भी नहीं जानता कि कब हमारे सामने कौन सी चुनौती आ उपस्थित होगी या फिर हम कब किस संघर्ष का सामना करने के लिए विवश हो जायेंगे| वस्तुतः, काल के प्रवाह में हम क्षण प्रति क्षण विभिन्न परिस्थितियों के ऐसे भंवरजाल में फस जाते हैं कि ‘यह करें या न करें ‘का निर्णय लेना कठिन हो जाता है |कभी-कभी तो प्रलोभन के ऊपर प्रलोभन हमें भ्रमित सा कर देते हैं और काल की गति तो इतनी अधिक तीव्र होती है कि समीपस्थ भविष्य ही वर्तमान बनकर हमें बहा ले जाता है और वही बीते हुए ‘कल’ में विलीन हो जाता है| हमें प्रत्येक क्षण शीघ्रता से अपनी बुद्धि तथा विचार-शक्ति के सहारे इस जड़-चेतन सृष्टि के साथ अपने व्यवहार के संबंध में निर्णय लेना पड़ता है |
चुनौती भरे क्षणों का सामना करते हुए हमें अनुसरण के लिए दो मार्ग दिखाई देते हैं-पहला ‘श्रेय’ तथा दूसरा ‘प्रेय’ का मार्ग |विवेकी मनुष्य संघर्षपूर्ण परिस्थिति के विभिन्न पक्षों को धैर्य-पूर्वक परख कर, श्रेय के मार्ग का अनुसरण करने का दृढ़ निश्चय करता है और सत्य, दया, प्रेम, सहिष्णुता जैसे शाश्वत नैतिक-मूल्यों के पथ पर चलते-चलते अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करता है |दूसरी ओर, प्रेय-मार्ग पर वे लोग चलते हैं जो सदा किसी न किसी वस्तु के पीछे भागती हुई अपनी इंद्रियों को रोक नहीं पाते और अपनी इच्छाओं तथा आशाआों के दास बनकर अविवेकी निर्णयों के कारण, अनुचित मार्ग पर चलते हुए अक्सर अपने लक्ष्य से विचलित हो जाते हैं | इस प्रकार प्रेय-मार्ग सुखकारी और श्रेय का मार्ग कल्याणकारी है |अब, जो कल्याणकारी है –वह सदा प्रिय लगे ऐसा होना आवश्यक नहीं है लेकिन इसके बावजूद जो विवेकी है,सच्चा साधक है,परिवार और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझता है, वह श्रेयस् के मार्ग पर चलता रहता है| चरम-लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में आनेवाली बाधाओं,विघ्नों और कष्टों से विचलित नहीं होता तथा यथेच्छ भौतिक सुखों के न मिलने पर भी दुःखी नहीं होता |इस तरह धीरे-धीरे वह अपने अन्तःकरण की शुद्धि के माध्यम से नित्य-आनंद, सुख एवं मानसिक-शांति प्राप्त करने लगता है और आगे आने वाले जीवन में अपने कार्यों को और अच्छी तरह से करने की कुशलता प्राप्त कर लेता है लेकिन प्रेय-मार्गी तो इस संसार की चमक-दमक से ऐसा आकर्षित होता है कि येन-केन प्रकारेण अर्थात् जैसे-तैसे भी धन-संग्रह करने या फिर शीघ्र इच्छा-पूर्ति करने में इतना अधिक तल्लीन हो जाता है कि उसे इसका आभास ही नहीं होने पाता कि कब उसने स्वयं ही अपने लिए दुखों को न्योता दे डाला क्योंकि सब इच्छाएं तो किसी की भी पूरी हो नहीं पातीं| अधूरी इच्छाएँ उसे न केवल निराशा देती हैं अपितु उसे मानसिक-स्तर पर भी असंतुष्ट बना देतीं हैं क्योंकि अब धीरे-धीरे उसे अपनी उन भूलों का अहसास होने लगता है जो उसने अपने परिवार अथवा समाज के प्रति की होती हैं |
अंततः, ऋषिगणों के वचनामृत तो इसी ओर संकेत करते हैं कि जीवन की चुनौतियों के चौराहे पर खड़े हम मनुष्यों को ईश्वर न तो प्रेय-मार्ग का अनुसरण करवा कर भौतिक सुख-साधनों के होते हुए भी असंतुष्ट रहने के लिए विवश करते हैं और न श्रेय-मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते हैं|दरअसल, मनुष्य को बाह्य सृष्टि के चक्र को बदलने की पूर्ण और सर्वत्र स्वतंत्रता नहीं है लेकिन फिर भी जगत् के संपर्क में क्षण-प्रतिक्षण सद्व्यवहार या दुराचरण करने के लिए मनुष्य स्वतन्त्र है और उसे अपने आचरण के सम्बंध में मिली उसकी यही स्वतंत्रता उसकी ‘मुक्तिसाधना’ है |इसी मुक्तिसाधना के सदुपयोग से श्रेय-मार्गी तो एक अच्छी ज़िंदगी व्यतीत करता है लेकिन प्रेय-मार्गी इसके दुरूपयोग द्वारा अपने सौभाग्य के क़दमों की आहट को ही अनसुना कर देता है| दरअसल, आपको नहीं लगता कि कुछ हद तक हम स्वयं ही अपने भाग्य के रचयिता हैं ?
ईश्वर करे, हम यथासंभव श्रेय-मार्ग पर चलकर ही अपने सपनों को साकार कर सकें |

 

 

 

स्वयं से प्रेम करें
प्रसन्न रहना ही सफल जीवन का राज़ है. ईश्वर ने मनुष्य को बहुत सारी खूबियाँ और अच्छाइयां दी हैं. मनुष्य वो प्राणी है जिसके अन्दर सोचने की और समझने की अपार क्षमता है. जो जीवन को बस यूँ ही जीना या व्यर्थ करना नहीं चाहता. हर व्यक्ति के अन्दर एक बहुत ही प्रबल इच्छा होती है सफल होने की, कुछ कर दिखाने की और अपनी एक पहचान पाने की. कुछ लोग अपनी इस इच्छा को दिन पर दिन बढ़ाते हैं और कुछ लोग समाज या परिश्रम के डर से इसे दबा देते हैं. पर अपने आप से पूछ कर देखिये कि कौन ऐसा जीवन जीना नहीं चाहता जिसमे लोग आप से प्रेम करें और आप को पहचाने. सफलता के कई सारे कारण होते हैं जैसे   द्रिढ़ निश्चय, मेहनत करना, सपने देखना और उन्हें पूर्ण करने की दिशा में कार्य करना, सच्चाई, इमानदारी,जोखिम उठाने की क्षमता इत्यादि.
पर सफलता का एक ऐसा कारक भी है जिसे हम अक्सर नज़रंदाज़ कर देते हैं और वो है स्वयं से प्रेम करना. अपने आप से प्रेम करना और अपना आदर करना सफल व्यक्तियों का एक बहुत ही प्रबल गुण होता है.
कभी आराम से बैठ कर सोचिये कि किस से सबसे अधिक प्रेम करते हैं आप? whom do you love most? ये बात अगर आप किसी से पूछें तो आम तौर पर जवाब आयेगा my parents, my children, my spouse etc etc जितने लोग उतने जवाब. अगर आप गहराई से सोचें तो इस प्रश्न का आप को एक ऐसा उत्तर मिलेगा जिसे आप मुश्किल से ही accept कर पाएंगे. और वो जवाब है ‘अपने आप से’. जी हाँ! इस दुनिया में सबसे अधिक प्रेम आप स्वयं से ही करते हैं. अगर देखा जाये तो हर छोटे से छोटा औए बड़े से बड़ा काम हम अपनी ख़ुशी के लिए ही तो करते है? चाहे वो विवाह के बंधन में बंधना हो, कोई नौकरी करना हो, माँ बनना हो, किसी की मदद करना हो, किसी को दुखी करना हो कुछ भी. हाँ! अंतर सिर्फ ख़ुशी पाने के स्रोत में होता है कुछ को दूसरों को ख़ुशी दे कर सुख मिलता है और कुछ को दूसरों के कष्ट से. महात्मा गाँधी, मदर टेरेसा और दुनिया के कई समाज सुधारक क्या इन्होनें अपनी ख़ुशी के बारे में नहीं सोचा? निःसंदेह सोचा, ये वे लोग थे जिन्हें दूसरों को प्रसन्न देख कर ख़ुशी मिलती थी. कुछ लोग स्वयं से प्रेम करने को अनुचित समझते हैं क्यों कि लोगों के मन में अक्सर ये धारणा रहती है कि जो व्यक्ति स्वयं से प्रेम करता है वो selfish होता है और दूसरों से प्रेम कर ही नहीं सकता. तो इसका उत्तर ये है कि अपने आप से प्रेम करना कभी ग़लत हो ही नहीं सकता क्यों कि जो व्यक्ति अपने आप से प्रेम नहीं करता वो किसी और से सच्चा प्रेम कर ही नहीं सकता. जो अपने आप से संतुष्ट नहीं वो किसी और को संतुष्ट कैसे रख सकता है?
‘unless you fill yourself up first you will have nothing to give to anybody’
अपने आप से प्रेम करने का अर्थ है स्वयं को निखारना, अपने अन्दर की अच्छाइयों को खोजना, अपने लिए सम्मान प्राप्त करना, अपना self statement positive रखना, अपने आप को प्रेरित करते रहना और अपने साथ हुई हर अच्छी बुरी घटना की जिम्मेदारी खुद पे लेना. ये हमेशा याद रखिये कि आप दूसरों को प्रेम और सम्मान तभी बाँट पाएंगे जब आप के पास वो वस्तु प्रचुर मात्र में होगी.स्वयं से प्रेम करना उतना ही स्वाभाविक है जिंतना कि सांस लेना. Bible में कहा भी गया है कि हमें दूसरों से भी उतना ही प्रेम करना चाहिए जितना हम स्वयं से करते हैं. परन्तु कभी – कभी हम अपने आप से प्रेम करना भूल जाते हैं. मशहूर psychologist Sigmund Freud ने मनुष्य के अन्दर दो प्रकार की instinct का ज़िक्र किया है एक constructive और एक distructive. कुछ लोग अपनी भावनाओं का प्रदर्शन constructive तरीके से करते हैं, उन लोगों को अच्छे कार्य करके प्रसन्नता मिलती है और कुछ लोगों को विनाश कर के और दूसरों को तकलीफ पहुंचा कर. अगर आप कोई भी distructive कार्य कर रहे हैं , अपने आप को उदास बनाये हुए हैं और अपने जीवन से निराश हैं तो आप स्वयं से प्रेम नहीं करते. जो व्यक्ति अपने आप से प्रेम नहीं करता वो दूसरों को तो प्रेम दे ही नहीं सकता क्यों कि किसी भी भाव को जब तक आप अपने ऊपर अजमा कर नहीं देखेंगे , उसका स्वाद खुद नहीं चखेंगे तब तक दूसरों के सामने उसे बेहतर बना कर कैसे पेश करेंगे. स्वयं से प्रेम करने का अर्थ ‘मैं ’ से नहीं है बल्कि इसका अर्थ है अपनी अच्छाइयों को पहचान कर उसे बहार निकलना और सही अर्थ में अपने आप को grow करना. मनोचिकित्सा में भी अपने जीवन से निराश और depressed patients के उपचार के लिए उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य ढूँढ़ने के लिए अर्थहीनता को दूर करने के लिए कहा जाता है. ज़रा सोचिये कि वो कौन सी मनःस्थिति होती होगी जिसमें मनुष्य आत्म हत्या करने कि ठान लेता है? ऐसी स्थिति केवल और केवल तभी उत्पन्न होती है जब मनुष्य का स्वयं से कोई लगाव नहीं रह जाता. वह किसी वजह से अपने आप से घृणा करने लगता है और अपने आप को दंड देता है. तो सोचिये! कि अपने आप से प्रेम करना कितना ज़रूरी है क्यों कि जिस दिन आप स्वयं से प्रेम करना छोड़ देंगे उस दिन आपके जीवन का अस्तित्व भी नहीं रहेगा क्यों कि ‘it is impossible that one should love god but not love oneself’. क्यों कि अपने जीवन की शुरुआत भी आप से ही है और अंत भी आप से. इसलिए ईश्वर से हमेशा प्रार्थना करनी चाहिए कि वो हमें ऐसे कार्य करने की शक्ति दे जिस से हम स्वयं का आदर कर पाएं. कहा भी गया है कि………

हमको मन की शक्ति देना मन विजय करें, दूसरों के जय से पहले खुद को जय करें.

 

 

 

5 चीजें  जो  आपको  नहीं  करनी  चाहिए  और  क्यों ?
 

 1) दूसरे  की  बुराई  को  enjoy करना
ये  तो  हम  बचपन  से  सुनते  आ  रहे  हैं  की  दुसरे  के  सामने  तीसरे  की  बुराई  नहीं  करनी  चाहिए , पर  एक और  बात  जो  मुझे  ज़रूरी  लगती  है  वो  ये  कि  यदि  कोई  किसी  और  की  बुराई  कर  रहा  है  तो  हमें  उसमे  interest नहीं  लेना  चाहिए  और  उसे  enjoy नहीं  करना  चाहिए . अगर  आप  उसमे  interest दिखाते  हैं  तो  आप  भी  कहीं  ना  कहीं  negativity को  अपनी  ओर  attract करते  हैं . बेहतर  तो  यही  होगा  की  आप  ऐसे  लोगों  से  दूर  रहे  पर  यदि  साथ  रहना  मजबूरी  हो  तो  आप  ऐसे  topics पर  deaf and dumb हो  जाएं  , सामने  वाला  खुद  बखुद  शांत  हो  जायेगा . For example यदि  कोई  किसी  का  मज़ाक  उड़ा रहा  हो  और  आप  उस पे  हँसे  ही  नहीं  तो  शायद  वो  अगली  बार  आपके  सामने  ऐसा  ना  करे . इस  बात  को  भी  समझिये  की  generally जो  लोग  आपके  सामने  औरों  का  मज़ाक  उड़ाते  हैं  वो  औरों  के  सामने  आपका  भी  मज़ाक  उड़ाते  होंगे . इसलिए  ऐसे  लोगों  को  discourage करना  ही  ठीक  है .

 

2) अपने  अन्दर  को  दूसरे  के  बाहर  से  compare करना
इसे  इंसानी  defect कह  लीजिये  या  कुछ  और  पर  सच  ये  है  की  बहुत  सारे  दुखों  का  कारण  हमारा  अपना  दुःख  ना  हो  के  दूसरे   की  ख़ुशी  होती  है . आप  इससे  ऊपर  उठने  की  कोशिश  करिए , इतना  याद  रखिये  की  किसी  व्यक्ति  की  असलियत  सिर्फ  उसे  ही  पता  होती  है , हम  लोगों  के  बाहरी यानि नकली रूप  को  देखते  हैं  और  उसे  अपने  अन्दर के यानि की असली  रूप  से  compare करते  हैं . इसलिए  हमें लगता  है  की  सामने  वाला  हमसे  ज्यादा  खुश  है , पर  हकीकत  ये  है  की  ऐसे  comparison का  कोई  मतलब  ही  नहीं  होता  है . आपको  सिर्फ  अपने  आप  को  improve करते  जाना  है और व्यर्थ की comparison नहीं करनी है.

 

3) किसी  काम  के  लिए  दूसरों  पर  depend करना
मैंने  कई  बार  देखा  है  की  लोग  अपने  ज़रूरी काम  भी  बस  इसलिए  पूरा  नहीं  कर  पाते क्योंकि  वो  किसी  और  पे  depend करते  हैं . किसी  व्यक्ति  विशेष  पर  depend मत  रहिये . आपका  goal; समय  सीमा  के  अन्दर  task का  complete करना  होना चाहिए  , अब  अगर  आपका  best  friend तत्काल  आपकी  मदद  नहीं  कर  पा  रहा  है  तो  आप  किसी  और  की  मदद  ले  सकते  हैं , या  संभव  हो  तो  आप  अकेले  भी  वो  काम  कर  सकते  हैं .
ऐसा  करने  से  आपका  confidence बढेगा , ऐसे  लोग  जो  छोटे  छोटे  कामों  को  करने  में  आत्मनिर्भर  होते  हैं  वही  आगे  चल  कर  बड़े -बड़े  challenges भी  पार  कर  लेते  हैं , तो  इस  चीज  को  अपनी  habit में  लाइए  : ये  ज़रूरी  है की  काम  पूरा  हो  ये  नहीं  की  किसी  व्यक्ति  विशेष  की  मदद  से  ही  पूरा  हो .

 

4) जो बीत गया  उस  पर  बार  बार  अफ़सोस  करना
अगर  आपके  साथ  past में  कुछ  ऐसा  हुआ  है  जो  आपको  दुखी  करता  है  तो  उसके  बारे  में  एक  बार  अफ़सोस  करिए…दो  बार  करिए….पर  तीसरी  बार  मत  करिए . उस  incident से जो सीख  ले  सकते  हैं  वो  लीजिये  और  आगे  का  देखिये . जो  लोग  अपना  रोना  दूसरों  के  सामने  बार-बार  रोते  हैं  उसके  साथ  लोग  sympathy दिखाने  की  बजाये उससे कटने  लगते  हैं . हर  किसी  की  अपनी  समस्याएं  हैं  और  कोई  भी  ऐसे  लोगों  को  नहीं  पसंद  करता  जो  life को  happy बनाने  की  जगह  sad बनाए . और  अगर  आप  ऐसा  करते  हैं  तो  किसी  और  से  ज्यादा  आप ही  का  नुकसान  होता  है . आप  past में  ही  फंसे  रह जाते  हैं , और  ना  इस  पल  को  जी  पाते  हैं  और  ना  future के  लिए  खुद  को prepare कर  पाते  हैं .

 

5) जो  नहीं  चाहते  हैं  उसपर  focus करना
सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हम जिस चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं उस चीज में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है.  इसलिए   आप  जो  होते  देखना  चाहते  हैं  उस  प
focus करिए

 


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